कृष्ण जन्माष्टमी 2018: यहां जानें जन्माष्टमी पूजा की सामग्री और विधि
जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों के बीच यह दुविधा है कि वह 2 तारीख को व्रत रखें या 3 सितंबर को। दरअसल भाद्रपद के कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में रात 12 बजे भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इसलिए हर साल इसी मुहूर्त में कान्हा का जन्मदिवस मनाया जाता है। लेकिन हर साल अष्टमी दो दिन होती है। जैसे इस बार अष्टमी तिथि 2 सितंबर की रात्रि को शुरू होकर 3 तारीख को समाप्त हो रही है।
पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की एक सूची यहां दी गई है. देखें:
एक खीरा, दही, शहद, दूध
एक चौकी, पीला साफ कपड़ा, पंचामृत
बाल कृष्ण की मूर्ति, एक सांहासन, गंगाजल
दीपक, घी, बाती
धूपबत्ती, गोकुलाष्ट चंदन, अक्षत
माखन, मिश्री, भोग सामग्री
तुलसी का पत्ता
कान्हा के श्रृंगार के लिए:
पीले वस्त्र और मोरपंख
वैजयंती माला और चूड़ियां
बांसुरी और मुकुट
इत्र और बांसुरी
पूजन विधि
बेशक जन्माष्टमी का पूजन मध्य रात्रि को होता है परंतु इसकी तैयारी प्रात:काल से ही प्रारंभ हो जाती है। इसके लिए सुबह स्नान आदि से निवृत हो कर भगवान को प्रणाम करके व्रत का संकल्प लें। इसके बाद केले के खंभे,आम और अशोक की पत्तियों से मंडप तैयार करके उसमें पालना सजायें।
घर के मुख्यद्वार पर मंगल कलश एवं मूसल स्थापित करें। इसके बाद मध्य रात्र होते ही शंख आैर घंटे की ध्वनि के बीच गर्भ के प्रतीक नार वाले खीरे से भगवान का जन्म कराएं। तत्पश्चात पंचोपचार पूजन करें। इसके लिए सर्वप्रथम बाल कृष्ण जिन्हें बाल मुकुंद भी कहते हैं, की मूर्ति को एक पात्र में रख कर दुग्ध, दही, शहद, पंचमेवा आैर सुंगध युक्त शुद्घ जल आैर गंगा जल से स्नान करायें, फिर उन्हें पालने में स्थापित करें, आैर वस्त्र धारण करायें।
इस अवसर पर भगवान को पीले वस्त्र पहनाना अति उत्तम माना जाता है। इसके बाद भगवान की विधि विधान से आरती करें। अंत में उन्हें नैवैद्य अर्पित करें। नैवैद्य में फल आैर मिष्ठान के साथ अपनी परंपरा के अनुसार धनिया, आटे, चावल या पंच मेवा की पंजीरी भोग लगाने के लिए शामिल करें। भगवान को इत्र अवश्य लगायें।
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद मिश्र के अनुसार अष्टमी तिथि 2 सितंबर को रात्रि 8:47 बजे से शुरू होकर 3 सितंबर को रात्रि 7:19 बजे तक रहेगी। वहीं कृतिका नक्षत्र 2 सितंबर को रात्रि 8:48 बजे तक रहेगा। रोहिणी नक्षत्र 2 सितंबर को रात्रि 8:49 बजे लगेगी, जो 3 सितंबर को रात्रि 8:04 बजे तक रहेगी।
पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की एक सूची यहां दी गई है. देखें:
एक खीरा, दही, शहद, दूध
एक चौकी, पीला साफ कपड़ा, पंचामृत
बाल कृष्ण की मूर्ति, एक सांहासन, गंगाजल
दीपक, घी, बाती
धूपबत्ती, गोकुलाष्ट चंदन, अक्षत
माखन, मिश्री, भोग सामग्री
तुलसी का पत्ता
कान्हा के श्रृंगार के लिए:
पीले वस्त्र और मोरपंख
वैजयंती माला और चूड़ियां
बांसुरी और मुकुट
इत्र और बांसुरी
पूजन विधि
बेशक जन्माष्टमी का पूजन मध्य रात्रि को होता है परंतु इसकी तैयारी प्रात:काल से ही प्रारंभ हो जाती है। इसके लिए सुबह स्नान आदि से निवृत हो कर भगवान को प्रणाम करके व्रत का संकल्प लें। इसके बाद केले के खंभे,आम और अशोक की पत्तियों से मंडप तैयार करके उसमें पालना सजायें।
घर के मुख्यद्वार पर मंगल कलश एवं मूसल स्थापित करें। इसके बाद मध्य रात्र होते ही शंख आैर घंटे की ध्वनि के बीच गर्भ के प्रतीक नार वाले खीरे से भगवान का जन्म कराएं। तत्पश्चात पंचोपचार पूजन करें। इसके लिए सर्वप्रथम बाल कृष्ण जिन्हें बाल मुकुंद भी कहते हैं, की मूर्ति को एक पात्र में रख कर दुग्ध, दही, शहद, पंचमेवा आैर सुंगध युक्त शुद्घ जल आैर गंगा जल से स्नान करायें, फिर उन्हें पालने में स्थापित करें, आैर वस्त्र धारण करायें।
इस अवसर पर भगवान को पीले वस्त्र पहनाना अति उत्तम माना जाता है। इसके बाद भगवान की विधि विधान से आरती करें। अंत में उन्हें नैवैद्य अर्पित करें। नैवैद्य में फल आैर मिष्ठान के साथ अपनी परंपरा के अनुसार धनिया, आटे, चावल या पंच मेवा की पंजीरी भोग लगाने के लिए शामिल करें। भगवान को इत्र अवश्य लगायें।

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